फिलो अवे



ठीक ऐसा ही विचार मेरे मन में भी आया था-"यह क्या है "?

                        वह दिन भी किसी आम दिन की तरह था।उस दिन  काॅलेज से वापस लौटते वक्त सहसा मेरा पूरा ध्यान एक अजीब-सी वस्तु पर जाकर ठहर गया,पास जाकर देखने पर पता चला कि वह एक डायरी है।मैं उस डायरी के मालिक को आस-पास ढूंढने लगा परंतु किसी को आस-पास न पाकर उस डायरी को उठा लिया लेकिन तभी मेरे मन में ख्याल आया कि किसी की डायरी पढ़ना अच्छी बात नहीं और इस वजह से मैंने उस डायरी को न पढ़ने का निश्चय किया ।मनुष्य  की फितरत है कि,उसे जिस काम के लिए मना किया जाता है, वह वही करता है इसलिए मैने भी उस डायरी को अपने पास रख लिया एवं अपने हाॅस्टल आ गया।मन में अजीब-से विचार आ रहे थे कि- "कहीं कोई गलती तो नहीं हो गई,कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं, क्या होगा उस डायरी में "आदि।मैं उस डायरी को पढ़ने के लिए बहुत उत्साहित था और आखिर रात 9:00 बजे वह क्षण आ ही गया।मेरे आँखों में अजीब सी चमक थी,चेहरे पर थोड़ी घबराहट और शरीर में अजीब-सा कम्पन।
                       ज्यों ही मैने डायरी को खोला मैं आश्चर्यचकित रह गया क्योंकि उसमें न तो किसी का नाम था,न पता और न ही फोन नंबर।उसमें केवल दो अजीब-से शब्द लिखे थे-"फिलो अवे"।मैं उन शब्दों का अर्थ जानना चाहता था परंतु उस रात न जान पाया।उस रात बहुत मुश्किल से सो पाया,मन में सिर्फ दो शब्द चल रहे थे-"फिलो अवे"।
                           To be continued.........



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