सत्ता विध्वंस


जो कुर्सी पर जाता है  वो ही घमंडी हो जाता है
न जाने  उनमें इतना पाखण्ड कहाँ से आता है 

राष्ट्रवाद के नारे सारे किसी कोने में दुबक के रोते हैं
और हमारे प्रतिनिधि मखमली  कम्बल लपेट कर सोते हैं 
देश का पोषक किसान तब बैरी नजर आता है
राजकोष का सारा रुपया धनपशु नोचकर खाता है  

भ्रष्टाचार , कालाधन,रोज़गार चुनावी जुमले होते हैं 
 सरसों के खेतों में ये समझो नागफनी को बोते हैं
श्वान  सरीखा  देश भी सिहों को आँख दिखाता है
तब मेरा ह्रदय उन चुनावी वादों को सरेराह नंगा पाता है


राजनितिक रूढ़ता से ग्रसित स्वार्थीयों संतानों सुनो
जनता के दुःख दर्दो से बेखबर ओ नादान सुनो
ये हिंदुस्तान हमारा है हमें खून पसीने से सींचना आता है 
जहा दिलों में है बसता भगत सिंह जो वीरगति को पाता है

अब चाहे हो कोई दल या कोई नेता सुधरने का अवसर एक न होगा
अब प्रजातंत्र की शक्ति दिखेगी 
 पाखण्ड पर संयमित विवेक न होगा

जब निज प्रजातन्त्र का सेवक ही मदमस्त हाथी हो जाता है 
साठ करोड़ जवानों को अंकुश भी थामना आता है   
अंकुश भी थामना आता है 
अंकुश भी थामना आता है

शैलेष पांडेय



Comments