I WISH



It was clearly the best thing that had happened to me. I remember the first time I met him, I felt nothing! This was obviously not going to work. But it did. He meant so much to me. And like all girls I had dreams of living in a distant land and living happily ever after. I wanted to work like crazy and be the best at everything I do. I am good at what I do, but it is not what I had planned and that makes me sad sometimes.

I still wonder what he must be like. What his work is like. I stalk him on Facebook but I am not on his friend list, so I can’t really know. He is married and I am glad. Even though I cried the day he got married, I am glad. It was my decision to leave him. He doesn’t know anything. How could I do this to him? Living with me is a battle and I just wouldn’t be happy if I made other people suffer.

That evening changed everything. It was a normal day and I was walking home from college, when Anirudh suddenly pulled me back and threw that acid on my face. It took three operations and lot of donation just to get my sight back.

 I have my parents and a lot of good people around me. I am happy. But I still wonder what if I had given him a chance. I never thought I would think of this. I never thought I would still want him. But I am the same person. The same person he knew so well. Still knows so well. I am okay most of the time. I have books and they are my favorite pastime.  But I connect him to every character I read, every song I hear. I wonder what it would be like to be with him, like old times.

I still have the books he gave me. I read them often. And I miss him. And it makes me sad that I don’t get to live with him on a distant land. I missed my chance. But I also worry about what would have happened if he didn’t want me anymore. That would be worse than this, to know that whom you loved did not really love you for what you were.

I am strong and independent, but I am human. I wish I could just know if he would accept me, even if I don’t get to be with him. Maybe someday I’ll know what I did was right or wrong, but my story will still be incomplete.

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Category : Nostalgia    03/09/2017


रोटी के टूकड़े


बहुत दिनों के बाद माँ ने,रोटी आज बनायी थी
शंभु चाचा घर आए थे,चाची भी तसरीफ लायी थी।

चुन्नी,चिंटू,मून्नी,मिंटू सबके चेहरे पर खुशहाली थी,
पेट में चुहे कुद रहे थे पर बाहर हरियाली थी।

बापू के चेहरे पर जाने,कैसे अजब से भाव थे?
बात पुरानी सोच-सोचकर बापू भी पछताए थे।

दद्दू ने बाँटा भाई- भाई को,बाँट दिया घर सारा था,
बर्तन बाँटे,आँगन बाँटा,बाँट दिया चौबारा था।

रोटी के टुकड़े देख-देख कर भाव ये मन में आते थे,
क्या पहले घर के मुखिया,घर को ही आग लगाते थे?

माँ के गहनों को बिकते देखा,बापू को बैल-सा जुतते
देखा और रोते बच्चों को देखा था,
सिमट चुके घर में मैंने,इच्छाओं को मरते देखा था।

शंभु चाचा और बापू के,आँसू ना कम होते हैं,
पता चला है ईसी बात से, अपने तो अपने होते हैं ।

काश! जुड़ पाते रोटी के टुकड़े और मिल पाते बिछड़े जन,
एकल से संयुक्त हो जाते खण्ड-खण्ड में बिखरे मन।

                                         -प्रशांत गाहिरे

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Category : Nostalgia    23/07/2017


जीवन की परीक्षा



  जीवन की परीक्षा सबसे कठिन है
  पास होकर के खुद पर अभिमान होगा
  छुट-पुट इम्तेहानो के डर से बैठना
  जिंदगी  का अपमान होगा
  लड़ते रहना है जब तक श्वास चलती रहे
  हर कदम जीत की सोच पलती रहे
  हौसला ऐसा हो जो दुनिया बदल दे
  कुछ करने की आग यूँ ही जलती रहे
  औरो के लिए जीने का मौका सबसे बड़ा सम्मान होगा
  जिंदगी की परीक्षा सबसे कठिन है
  पास होकर के खुद पर अभिमान होगा ।
  बुजदिल ना बने सदा ध्यान हो
  अपनी खूबी का हरदम हमें भान हो
  किसी की उम्मीद किसी का भरोसा
  टिका है  हम पर सदा ज्ञान हो
  चिंता क्यों हम करें हार के वार की
  कौन कहता है क्या,झूठे संसार की
  डर के हालात से जो मौत का साथ ले
  सचमुच बुजदिल वो इंसान होगा
  जीवन की परीक्षा सबसे कठिन है
  पास होकर के खुद पर अभिमान होगा ।
                                     प्रशांत गाहिरे •••

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Category : Nostalgia    13/07/2017


फिलो अवे भाग-3


मुझे यह तो ज्ञात हो गया था कि,वह डायरी अवश्य ही किसी छात्र की थी।मैंने पुनः अपने खाली समय में उस डायरी को खोला एवं पढ़े गए पन्नों को पलटकर नए पन्नों की ओर बढ़ चला परंतु जो मेरे सामने था,उसे देखकर मैं भौचक्का रह गया
                                ये क्या आगे के ढेर सारे पन्ने उस डायरी से फट कर अलग हो चुके थे।कुछ देर तक तो मैं उन पन्नों के फटने का कारण सोचने लगा परंतु कुछ ना सुझने पर आगे बढ़  चला।अंततः मुझे एक शब्दों से परिपूर्ण पन्ना मिला जो इस प्रकार से था-

दिनांक-10-04-2016                              समय-9:40pm

"आज बहुत दिनों के बाद मैंने अपना फेसबुक अकाउंट चेक किया।तभी अचानक मुझे उसकी प्रोफाइल दिख गई, मैंने रूककर उसे फ्रेंड रिकवेस्ट भेजा।किसी ऐसी लड़की को जिसे मैं करीब से नहीं जानता था, भेजा गया मेरा पहला फ्रेंड रिकवेस्ट था।कुछ समय के बाद मुझे पता चला कि,उसने मेरा रिकवेस्ट स्वीकार कर लिया था।मुझे अच्छा लग रहा था,मैंने उसे हाई बोला और उधर से भी सेम मैसेज आया।वैसे तो मैं लड़कियों से बहुत कम बात  करता हूँ लेकिन उससे बात करके अच्छा लगा।पढाई से रिलेटेड हमने बहुत सी बातें की।मुझे पता चला कि,वह भी उसी टाॅपिक पर असाईनमेंट लिखने का सोच रहीं थी,जो मैंने सोचा था।मन ही मन मैंने कहा Same Pinch.....
                                        To be continued.....

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Category : Nostalgia    16/07/2017


कोशिश की है


 हम ने तुझे कभी नही चाहा
पर तुझे पाने की कोशिश की है,
हम करीब तेरे कभी नही आए
पर पास आने की कोशिश की है ।

तुझे दिमाग मे कभी नही आने दिया
पर दिल मे छुपाने की कोशिश की है,
हालाकि याद रोज़ आते हो तुम
पर तुम्हे हि भूलाने की कोशिश की है ।

हम दूर तुझसे कभी न हो पाएंगे
पर तुझसे हि दूर जाने की कोशिश की है,
हार तो कभी न पाएंगे इस दिल से
पर इस दिल को हाराने की कोशिश की है ।

गिरते है आंसु इस पतझड़ के मौसम में
फिर भी खुद को हँसाने की कोशिश की है,
सच कड़वा है कि चला गया है बसंत
फिर भी इस कड़वे सच को अपनाने की कोशिश की है ।

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Category : Nostalgia    20/06/2017


दोजख कँहा है ?


सवालात फरमाया गया
दोजख कँहा है ?
हाजिर-ए-जवाब आया
जहाँ इस कदर अंधेरा छाया है कि
रवि सहर नही कर पाता
दोजख वहाँ है ।

सवालात फरमाया गया
दोजख कहाँ है ?
हाजिर-ए-जवाब आया
जहाँ अल्ताफ  और नवाज़िस
बेकार और शिफर है
दोजख वहाँ है ।

सवालात फरमाया गया
दोजख कहा है ?
हाजिर-ए-जवाब आया
जहाँ मुसलसल और पासवान
रक़ीब बन जाए
दोजख वहाँ है ।

सवालात फरमाया गया
दोजख कहाँ है ?
हाजिर-ए-जवाब आया
जहाँ उन्स ,लहजा और इनायत
मयस्सर नही है
दोजख वहाँ है ।

सवालात फरमाया गया
दोजख कहाँ है ?
हाजिर-ए-जवाब आया
जहाँ ख्वाब बुनने का हक
फकीर और तंग-हाली को नही
दोजख वहाँ है ।

खुदा ने दोजख बनाया है
तो वह जगह बदस्तूर हि रखे ,
रुख करना  पड़े  वहाँ का हमे
हम ऐसा कोई कर्म न करे ।


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Category : Nostalgia    20/06/2017


Goods & Services Tax (GST)



Goods & Services Tax (GST) is an indirect tax, introduced following the passage of Constitution 122nd Amendment Bill, throughout India to replace all the existing taxes levied by the central and state governments. It is directly under the Union Finance Minister. GST is launching from 1st July 2017 midnight.

There will be three kinds of GST:

CGST: to be collected by central government

SGST: to be collected by state governments for intra-state sales

IGST: to be collected by central government for inter-state sales

Advantages:

·       Transparent tax and reduces the number of indirect taxes.

·       No hidden taxes and lowers the cost of doing business.

·       Prices will come down as double taxation will not be playing a role.

·       It will be levied only at the final destination based on VAT principle and not at various points.

It will help building a transparent and corruption free tax administration.

Disadvantages:

·       Negative impact on real estate hiking up the cost of new homes by about 8%.

·       Some retail products will see a hike in their prices especially clothing.

·       Service taxes or airfare varies from 6%-9%. After GST it will be over 15%, almost double the present rates.

 

GST has been one heck of a hype-cum-trending topic for debate lately. The common man is wondering what would be its effect on the daily life. Whatever be the cause of action, its true conclusion could only be drawn after its implementation. 

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Category : Nostalgia    30/06/2017


फिलो अवे भाग-2


अगले दिन भी प्रत्येक क्षण वहीं दो शब्द मस्तिष्क में गुँज रहे थे-"फिलो अवे"।मैंने उन शब्दों का अर्थ गूगल पर भी छान मारा,मुझे ढेरों अर्थ मिले परंतु मुझे उन शब्दों के वास्तविक अर्थ की प्राप्ति न हो सकी।अपने खाली समय में मैं उस डायरी को लेकर एकांत में बैठ गया और अर्धमन से पन्ना पलटाया।अगला पन्ना लेखक के शब्दों में ऐसा था-

दिनांक- 21/07/2015                   समय-8:45pm

"आज काॅलेज का पहला दिन था और अजीब-सी घबराहट थी मन में।बारहवीं कक्षा तक का सफर तो अच्छा ही रहा लेकिन अब भगवान जाने आगे आगे क्या होगा?ऐसा लग रहा था कि,जैसे सब काॅलेज घुमने आए थे।उन दो लड़कियाँ को देखकर जो सीढ़ियों पर बैठी थीं ऐसा लगा जैसे वे माॅडलिंग करने काॅलेज आयीं थीं ।काॅलेज के पहले दिन ही मैंने जान लिया कि,काॅलेज ठीक वैसा ही होता है जैसा मैंने सोचा था क्योंकि मुझे कुछ लड़के बाइक उड़ाते भी दिख गए थे ।
                           आज पहली बार ये एहसास हुआ कि, मैं बड़ा हो गया हूँ, मेरा प्यारा बचपन गुजर चुका है और मैं बड़े लोगों के बीच हूँ ।आज एक भी क्लास नहीं लगी इसलिए थोड़ा अच्छा लग रहा था।दोपहर में मैं काॅलेज के कैंटीन पहुँचा जहाँ लोग नाश्ता करने कम,बतियाने ज्यादा पहुँचे थे।कैंटीन के अंतिम छोर पर अपनी ही दुनिया में खोए,जोड़ो को देखकर  मैं सोच रहा था कि,वे काॅलेज पढ़ने आते हैं या ये सब करने अचानक मुझे पापा की वह बात याद आ गई जो उन्होंने घर से निकलते वक्त मुझसे कहा था कि- काॅलेज जाकर कई लोग भटक जाते हैं ।तब मैंने पापा से न भटकने का वादा किया 
था।काॅलेज के पहले ही दिन ने बहुत थका दिया।किराए के कमरे में खुद से बनाया गया खाना खाते वक्त माँ की याद आ रही थी कि,कैसे बहुत अच्छे खाने में भी मैं कमियाॅ निकाला करता था और आज कमियों से भरे खाने को भी बिना किसी शिकायत के खा रहा था "।
                To be continued....

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Category : Nostalgia    12/06/2017


सच्चा देशभक्त : बास्को


सच्चा देशभक्त : बास्को


यह एक सच्ची घटना है जो दो दशक पहले की है जब भारतीय सेना कश्मीरी घुसपैठियों के खिलाफ संघर्ष कर रही थी 

कारगिल सेक्टर के बेस कैंप में सेना के डॉग मास्टर  मेजर नारायण राणा अपने सर्च डॉग बास्को के साथ रोज़ लैंडमाइंस की खोज पर जाया करते थे हर रोज़ के भांति उस रोज़ भी सर्द हवाएं चल रही थी सुबह के करीब 8 बजे थे और मेजर राणा अपने समझदार साथी  बास्को के साथ गश्त पर थे सेना के इस समझदार डॉग की सूझबूझ ने कई बार बड़े हादसों को टाला था इसलिए सब उसकी काबिलियत पर काफी भरोसा करते थे

उस दोपहर वहां से सेना के अफसरों का एक बड़ा काफिला गुज़रने वाला था इसलिए हर संभव सावधानी बरती जा रही थी 

कैंप के गेट के बाहर स्थानीय निवासी क़ादिर की चाय की दुकान थी जहा अक्सर जवान आया जाया करते थे क़ादिर सेना को संदिग्धों की मुखबिरी भी किया करता था इसलिए मेजर भी वहां अक्सर रुका करते थे और क़ादिर से उनकी अच्छी जमती थी 

उस रोज़ क़ादिर की दुकान पर एक अजनबी भी था और बातचीत में उसने मेजर से वहां रोज़गार के लिए आए होने की बात कही लेकिन आज हमेशा अपनी धुन में रहने वाला बास्को उसपर काफी भौक रहा था यह बात मेजर को भी अस्वाभाविक लगी लेकिन मेजर बास्को को लेकर वहां से चले गए 

बास्को बार बार क़ादिर की दुकान की तरफ बढ़ने की कोशिश करता लेकिन मेजर राणा को लगा कि शायद बास्को की दिलचस्पी वहां रखे बिस्किटों में है 
कैम्प पहुँच मेजर ने उसे बाँध दिया और पोस्ट पर चले गए लेकिन बास्को लगातार भौकता रहा 

घंटो की मशक्कत के बाद बास्को वहां से अपनी चेन तुड़वा कर भाग निकला और सीधा क़ादिर की दुकान की तरफ बढ़ा उसे लग रहा था कि वहां कुछ तो गड़बड़ ज़रूर है जैसे ही वह गेट की पास पहुंचा तो उसने देखा कि क़ादिर उस अजनबी के साथ मिलकर पूरे क्षेत्र में विस्फोटकों का जाल बिछवा चुका था और थोड़ी ही देर में सेना का काफिला वहां पहुँचने वाला था

बास्को वतन को संकट में देख बिना वक्त गवाये उस अजनबी पर टूट पड़ा और उसकी गर्दन पर अपने दांत गड़ा दिए यह देख गद्दार क़ादिर ने उसपर चाक़ू से कई वार किए लेकिन उसने अपने  दांतो के घातक वार से उस आतंकी को अधमरा कर दिया और पूरी ताक़त बटोर क़ादिर पर टूट पड़ा और उसे अपनी मज़बूत पकड़ से रोके रखा 

सेना के काफिले में सबसे आगे चल रहे लेफ्टिनेंट शिंदे ने संदिग्धों को दूर से देख फौरन काफिले को रोक दिया और जब सेना की एक पैदल टुकड़ी  वहां पहुंची तो  उन्होंने देखा कि दोनों गद्दार  विस्फोटकों के ढेर के बीच अचेत पड़े हुए हैं और अपनी आखरी साँस तक लड़ने वाला सेना का वफादार बास्को शहीद हो गया है लेकिन उसने सैकड़ो सैनिकों की जान बचा ली 

लेफ्टिनेंट साहब ने बड़े गंभीर स्वर में कहा कि *आज इस बेज़ुबान ने साबित कर दिया  कि इंसानो से कहीं बेहतर जानवर हैं जिनमे इंसानो से कहीं ज़्यादा इंसानियत  हैं*

अगर बास्को एक कुत्ता न हो के कोई इंसान होता तो शायद वीरता की इस अनोखी शौर्यगाथा को दुनिया के सामने आने में 20 साल का समय नही लगता 


कहानी
शैलेष पांडेय

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Category : Nostalgia    12/06/2017


वह पापा की शहज़ादी थी


वह पापा की शहज़ादी थी
बड़े नाज़ों से वो पली बढ़ी
मेहनत की उसने जीवन में
और हुई अपने पैरों पे खड़ी

वो गयी बड़े एक शहर में
रम गयी जीवन की लहर में
वह ना जान सकी अँधेरा है
हैवानियत का वहां बसेरा है

उस रात उसे कुछ देर हुई
सब चले गए वह तनहा थी
दरिंदगी जिसके करीब थी
एक बेबस सा वो लम्हा थी

थी सहमी सी वो उन राहों में
तब उसको था एक हाथ दिखा
मानवता का वह हत्यारा 
अपने साथियों के साथ दिखा

एक मोड़ जहां अँधेरा था 
था वहां भेड़ियों का साया
जब आँखें खोली उसने तो
उन दरिंदों को था सामने पाया

एक बेटी उस दिन चीखी थी
पर कोई मदद ना मिली उसे
उन भेड़ियों ने उसको नोचा 
और वहीं तड़पता छोड़ गए

बड़ा शर्मनाक वह मंज़र था
थी इंसानियत सबकी खोयी
उसकी हालत को देख देख
मानवता तिल-तिल कर रोयी

जब उसके पापा को सच पता चला
उनका दिल सहसा दहल गया
जो चेहरा कल तक खिला सा था
वो चेहरा बिलकुल बदल गया

लाखों चेहरे यूँ ही बदले
जीवन लाखों यूं ही बिगड़े
खुले गुनहगार वो  घूम रहे
ताक़त के नशे में झूम रहे

कानूनी हाथ हुए छोटे
शायद लालच ने है उन्हें तोड़ दिया
गुनहगार तो यूँ हम सब भी है
जो उन कुत्तो को आवारा छोड़ दिया

निर्भया के लिए जी लगा दिया
फिर भी ना उसको बचा सके
हाँ दर्द मुझे भी हुआ था जब
गुनाहगारों को सज़ा न दिला सके

आवाज़ उठेगी  जब जब भी
निज पाखंडी उसे दबाएंगे
बदलाव तभी है सम्भव जब
हम सब मिलकर सामने आएंगे

हैं लाखों लड़कियां उस जैसी।
इन्साफ जिन्हें है मिला नही
हर पल इसी ख़ौफ़ में जीती हूँ
कहीं मैं तो अगली निर्भया नही




*काव्य-रचना*
*शैलेष कुमार पांडेय*
*जी.जी.यू. बिलासपुर*
✍✍✍✍✍✍✍✍

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Category : Nostalgia    12/06/2017