वो पत्थर वो नज़ारे


कम-से-कम एक किलोमीटर ऊचाँ था वो पहाड़ और लगभग चार-पाँच किलोमीटर चौड़ा था,पर जाने क्यों इतने बड़े क्षेत्र में मुझे बस वो पत्थर हि दिखा। कोई चुम्बाकीय तत्व था शायद, जो मुझे अपने ओर खींचने का प्रयत्न कर रहा था । मैं बदहावास सी हो गयी थी, अब मेरे पैर रुकना नही चाहते थे , लग रहा था जल्द से जल्द वहाँ पहुचँ जाँऊ । पैरो ने अपनी रफ़तार अपनेआप बढ़ा लिया और फिर मेरे खयाल भी उस दौड़ में हिस्सा लेते हुए अपनी तेजी को बढ़ाने लगे, फर्क इतना-सा है कि पैरो की मंजिल वो पत्थर है और मेरे खयालो को अपनी मंजिल का पता हि नही पता । जिस कदर मै आगे बढ़ने के लिए अपने पैरो पर हिंसक होते जा रही थी उसी प्रकार मेरे खयालो का सागर मुझे पीछे बहाने के लिए ऊतारु था । मेरे खयाल एक सागर-सा रुप ले चुके थे , जिसका न कोई अंत था और न हि जिसके बिखराव को सामेटा जा सकता था । पुरानी यादे , जज्बात, अकेलापन ,सब आँखो के सामने चित्रित होने लगे , और वो चित्र अपने साथ-साथ उन्ही आँखो में नमी भी भर गए । एक कसमाकस-सी महसूस होने लगी थी , मै हाफँने लगी थी ,फिर मैं थोड़ी देर के लिए ठहरी ,मन को समझते हुए कहा हटा ना यार। मैंने फिर शरुवात की , भले ही मेरे  खयालो अब में ठहराव आ चुका था पर उस पत्थर तक पहुँचने का उत्साह अभी तक बरकारार था । अब की बार मेरे पैर चलना नही बल्कि दौड़ना चाहते थे चूंकि इस बार मेरे खयाल मुझ पर मेहरबान थे , हकीकत से परे सिर्फ सपने दिखाए और उन सपनो के बल मैं मंजिल तक पहुँच  गयी ।  अरे !  मन में था और होठो पर ये तो लाज्मी थावाली मुस्कान  थी । मानो मुझे मेरा मितान मिल गया हो , पूरे पहाड़ में सबसे बड़ा पत्थर था वो और उस पर खरोंचो के  निशान उसके बड़े होने की जिम्मेदारी साफ-साफ दर्शा रहे थे । हजारो पत्थर थे वहाँ पर अपनी जगह पर वह अकेला था , मै उसके और शायद अपने अकेलापन को दूर करना  चाहती थी सो मै उस पर बैठ गयी , धीरे से उसको सहलाते हुए उस पर अपना हाथ रखा । अब नज़र नज़ारो पर गयी ,थोड़ी देर के लिए मै स्थिर और दंग हो गयी थी , मै उन नज़ारो को देखने की खुशी लिखित मौखिक या  किसी भी रुप में व्यक्त नही कर सकती ।चारो तरफ पहाड़ो की हरियाली और उन पर  आने वाली बारिश की सफेद चादर ने मेरी नज़रो को तृप्त कर दिया था । मै बस  उन नजारो को निहारना चाहती अब , और  बस अपने बारे में सोचना चाहती थी , बस अपने बारे में । वो नजारा  भले दुनिया का सबसे खूबसूरत नज़ारा न हो पर मेरे लिए वो दृश्य देखना सबसे खूबसूरत एहसास था, क्योंकि उस जगह ने मुझे अकेलेपन की हकीकत और सपनो के भ्रम का एहसास करवाया था ।  मै वहाँ बसना  चाहती थी मै लीन हो चुकी थी ,तभी मेरे साथ आए मेरे दोस्त भी वहाँ पहुँच गए । मेरा ,पत्थर और उन नज़ारो का जुड़ाव उनके आते हि टूट गया ।हजारो सेल्फि  ने नज़ारो को कैद कर लिया था ,बेमन हि सही उन नजारो शायद अपने इस मितान के लिए खुद को सेल्फि में बसा लिया था । सब आगे की ओर बढ़ने लगे, मै नही जाना चाहती थी तभी  एक दोस्त ने चिल्लाकर बोला चल ना यार ,यहाँ घर नही बनाना है मैने कहा हाँ आती हुँ।उसे क्या पता वहाँ घर हि बनाना था मुझे, फिर मै उस पत्थर पर दोबारा बैठ गयी  उसने मुझे मैने उसे महसूस किया ,नज़ारो को फिर निहारा , आँखे थमना नही चाहती थी ,वो पत्थर और वो नज़ारे दोनो मुझे थामना चाहते थे । अपनी जिन्दगी में शायद पहली बार मै ठहराव लाना चाहती थी के तभी  फिर पीछे से आवाज़ आयी चल ना रे  । मै उठी ,धीरे-धीरे चलने लगी , पलट कर नही देखा । पत्थर  और नज़ारो से कुछ दूर आने के बाद मुझे रिमझिम –सी बुंदे महसूस हुई , मै खुश हो गयी क्योँकि उस पत्थर को , उन नज़ारो को बरसात के रूप में नया मितान मिल चुका था और शायद मुझे भी , उन दोनो को मेरी कमी नही खलेगी और शायद मुझे भी । वो बरसात हम तीनो को फिर जोड़ गयी...............    

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Category : Nostalgia    01/01/2018


ग़ज़ल (अख़िरी लम्हें)


बिछड़ कर तुमसे जीलें हमको दुआ ना देना
  अगर मेरी याद आए तो मुस्करा देना 

       दुआ कुबूल हो जाएगी ख़ुदा से कि हुई 
किसी रोते हुए को बस हँसा देना 

दौलत आजतक किसी का प्यार ना ख़रीद सकी 
किसी को यूँ ही मत ठुकरा देना 

ये लकीरें कल बताएंगी वो मेरी नहीं 
अच्छा है अभी इनको मिटा देना 

खेल अपनो से हो तो हार जाना तुम 
अच्छा तो नहीं अपनो को हरा देना 
                              Ankit kumar (9169703431) 



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Category : Nostalgia    05/11/2017


आओ कुछ बातें करते हैं



आओ   कुछ    बातें    करते   हैं   

 

आज   आखिरी    दिन    है        साल    का,

   कल    से    तारीख़े    भी    बदल    जायेंगी।

 

आओ    कुछ    देर    बैठते   हैं ,   बातें    करते    हैं,   

माना    कि    बहुत    दिन    से    कुछ  बात    नहीं    की    हमने,

मगर    कुछ    देर    बात    कर    लेने    से    कुछ    बिगड़    तो        जायेगा।   

 

शायद    कुछ    ग़लतफ़हमियाँ    थी    हमारे    बींच,

या    शायद    कुछ    गलतियाँ    अनजाने    में    हो    गयी    होंगी।   

 

आओआज    इस    आखिरी    दिन    को    थोड़ा    सा    हिसाब    कर    लेते    हैं ,   

दोनों    मिल    के,    एक    दूसरे    से,    एक    दूसरे    की    जी    भर    के    शिकायतें    लेते    हैं,

चीख़    लेते    हैं,    चिल्ला    लेते    हैं,    ज़रूरत    हो    तो    दो    चार    गालियाँ    भी    दे    देते    हैं,

 

मगर    जो    भी    आज    सब    हिसाब    कर    लेते    हैं।   

 

आज    अपने    दिलों    में    बसी    नफ़रतों    की    यहीं    कब्र    बना    देते    हैं,

या    गर    मंजूर    हो    तो    यहीं    चिता    जला    देते    हैं,

आज    इस    मंदिर-मस्जिद    के    मुद्दे    को    हमेशा    के    लिए    यहीं    दफ़न    कर    देते    हैं।   

 

कल    सुबह    में    मैं    अजान    दे    देता    हूँ,    तुम    भोर    में    मंत्रों    के    साथ    शंखनाद    कर    देना।   

 

आओ,    हम    दोनों    अब    साथ    मिल    के    लड़ा    करेंगे,

अब    हम    अपने    वतन    के    लिए    लड़ा    करेंगे,

 

आओ,    हम    अब    अपनी    मोहब्बत    के    लिए    लड़ा    करेंगे,   

अब    हम    अपनों    के    सुकून    के    लिए    लड़ा    करेंगे,

 

और    कसम    खाते    हैं    की    हम    अब    आपस    में        लड़ा    करेंगे।   

 

आओ    कुछ    देर    बैठते    हैं,   

आओ    कुछ    बातें    करते    हैं।

 

-समीर   "इंक़लाबी"

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Category : Nostalgia    31/12/2017


अश्को की ज़ुबान


मै रोना नही चाहती
आँसु अपने आप निकल गए
दिल में दबे मोम से अरमान
अश्को के रुप में पिघल गए ।
 
रोका अश्को को थामा अश्को को
पर ये तो आँखियन से बाहर आने को मछल गए
आँखियन  से जो बाहर ये निकले
भड़कती आग की चिंगारी से ये जल गए ।
 
किसी ने मोती समझा किसी ने मात्र पानी
खुशियो को मेरे वे निगल गए
पर अश्को की ठंडक ने सुकून भी दिया
और धीरे-धीरे हम संभल भी गए ।

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Category : Nostalgia    05/10/2017


चाँद प्यारा है बहुत


हाल जो भी है.. तुमसे बताऊँ कभी

  सोचता हूँ तुम्हें दिल से लगाऊँ कभी 

चाँद एक तू ही है जो बात करता है और दूर है हमसे 
सोचता हूँ कि तेरे पास मै आऊँ कभी 


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Category : Nostalgia    25/11/2017


मारकेट में नया


"मारकेट में नया" यह वाक्य ऐसे धड़ल्ले से उपयोग किया जा रहा है कि,क्या कहें।सालो-साल पुरानी बात या वस्तु समाज में हर बार "मारकेट में नया" टैग चिपकाकर प्रसारित कर दी जाती है।सोशल मीडिया तो जैसे इन टैग चिपकी वस्तुओं की दुकान बन चुकी है जहाँ पुरानी वस्तुएँ हर बार नई बतलाकर बेच दी जाती है।

           अल्काइन चचा अपने जीवन के अंतिम पलो में "मारकेट में नया" से बहुत प्रभावित हुए थे।समाज में क्या नया है जानना चाहते थे।सो जैसे ही  चचा के प्राण पखेरू उखड़े,चचा सोशल मीडिया पर अटके।किसी चुटकुले पर सवार हो गए जिस पर "मारकेट में नया का जिक्र था।न जाने कितने ही अंधेरे रास्तों से गुजरे,कितने ही मिलो की डिजिटल यात्रा की तब उन्हें पता चला कि, वह चुटकुला तो दो वर्ष पुराना था।बेचारे चचा! अपना सा मुॅह लेकर रह गए।पुनः बड़ी सतर्कता एवं जाँच-पड़ताल के बाद किसी संदेश पर सवार हो गए।डिजिटल संजालो के मध्य,तारो से छेड़खानी करते हुए पुनः लम्बी यात्रा की तब उन्हें पता चला कि,वह संदेश  1 लाख  बार आदान-प्रदान हो चुका है।चचा के कुछ नए देखने की जिज्ञासा शांत नहीं  हो रही थी।चचा लोगों पर  झल्ला रहे थे- "कमबख्त आज तक मारकेट में नया कहकर लकीर पीटते थे  और हम कहते रहे की समाज तरक्की कर रहा है।अगर ये शोध कार्य हमारे द्वारा न किया जाता तो हम धोखे में चले जाते"।

लेकिन ये क्या चचा एकाएक झूम उठे,ये कैसा अजब सा विज्ञापन सोशल मीडिया पर प्रसारित हो रहा है।अरे ये तो सच में "मारकेट में नया" है।

      चचा इतने खुश हुए कि,प्रकाश के वेग से पृथ्वी लोक छोड़ परलोक चले गए।परलोक के पहरेदार ने उनसे वहां पहुँचने में देरी व उनकी खुशी के बारे में पुछा तब चचा बोले-"मियाँ! मारकेट में नया देखकर आ रहा हूँ।

पहरेदार-"क्या नया"?

चचा-"बरखुरदार आत्महत्या के 101 तरीके का विज्ञापन देख के आ रहा हूँ।देखना जल्द ही मेरे लोग यहाँ पहुँच जाएंगे।

पहरेदार-" मारकेट में जब भी कुछ नया आता है,यहाँ लोगों की तादाद बढ़ जाती है,हाल ही में ब्लू व्हेल के कारण आए थे,अब लाल व्हेल की वजह से आएंगे"।

                         ----प्रशांत गाहिरे-----

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Category : Nostalgia    27/09/2017


I WISH



It was clearly the best thing that had happened to me. I remember the first time I met him, I felt nothing! This was obviously not going to work. But it did. He meant so much to me. And like all girls I had dreams of living in a distant land and living happily ever after. I wanted to work like crazy and be the best at everything I do. I am good at what I do, but it is not what I had planned and that makes me sad sometimes.

I still wonder what he must be like. What his work is like. I stalk him on Facebook but I am not on his friend list, so I can’t really know. He is married and I am glad. Even though I cried the day he got married, I am glad. It was my decision to leave him. He doesn’t know anything. How could I do this to him? Living with me is a battle and I just wouldn’t be happy if I made other people suffer.

That evening changed everything. It was a normal day and I was walking home from college, when Anirudh suddenly pulled me back and threw that acid on my face. It took three operations and lot of donation just to get my sight back.

 I have my parents and a lot of good people around me. I am happy. But I still wonder what if I had given him a chance. I never thought I would think of this. I never thought I would still want him. But I am the same person. The same person he knew so well. Still knows so well. I am okay most of the time. I have books and they are my favorite pastime.  But I connect him to every character I read, every song I hear. I wonder what it would be like to be with him, like old times.

I still have the books he gave me. I read them often. And I miss him. And it makes me sad that I don’t get to live with him on a distant land. I missed my chance. But I also worry about what would have happened if he didn’t want me anymore. That would be worse than this, to know that whom you loved did not really love you for what you were.

I am strong and independent, but I am human. I wish I could just know if he would accept me, even if I don’t get to be with him. Maybe someday I’ll know what I did was right or wrong, but my story will still be incomplete.

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Category : Nostalgia    03/09/2017


रोटी के टूकड़े


बहुत दिनों के बाद माँ ने,रोटी आज बनायी थी
शंभु चाचा घर आए थे,चाची भी तसरीफ लायी थी।

चुन्नी,चिंटू,मून्नी,मिंटू सबके चेहरे पर खुशहाली थी,
पेट में चुहे कुद रहे थे पर बाहर हरियाली थी।

बापू के चेहरे पर जाने,कैसे अजब से भाव थे?
बात पुरानी सोच-सोचकर बापू भी पछताए थे।

दद्दू ने बाँटा भाई- भाई को,बाँट दिया घर सारा था,
बर्तन बाँटे,आँगन बाँटा,बाँट दिया चौबारा था।

रोटी के टुकड़े देख-देख कर भाव ये मन में आते थे,
क्या पहले घर के मुखिया,घर को ही आग लगाते थे?

माँ के गहनों को बिकते देखा,बापू को बैल-सा जुतते
देखा और रोते बच्चों को देखा था,
सिमट चुके घर में मैंने,इच्छाओं को मरते देखा था।

शंभु चाचा और बापू के,आँसू ना कम होते हैं,
पता चला है ईसी बात से, अपने तो अपने होते हैं ।

काश! जुड़ पाते रोटी के टुकड़े और मिल पाते बिछड़े जन,
एकल से संयुक्त हो जाते खण्ड-खण्ड में बिखरे मन।

                                         -प्रशांत गाहिरे

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Category : Nostalgia    23/07/2017


जीवन की परीक्षा



  जीवन की परीक्षा सबसे कठिन है
  पास होकर के खुद पर अभिमान होगा
  छुट-पुट इम्तेहानो के डर से बैठना
  जिंदगी  का अपमान होगा
  लड़ते रहना है जब तक श्वास चलती रहे
  हर कदम जीत की सोच पलती रहे
  हौसला ऐसा हो जो दुनिया बदल दे
  कुछ करने की आग यूँ ही जलती रहे
  औरो के लिए जीने का मौका सबसे बड़ा सम्मान होगा
  जिंदगी की परीक्षा सबसे कठिन है
  पास होकर के खुद पर अभिमान होगा ।
  बुजदिल ना बने सदा ध्यान हो
  अपनी खूबी का हरदम हमें भान हो
  किसी की उम्मीद किसी का भरोसा
  टिका है  हम पर सदा ज्ञान हो
  चिंता क्यों हम करें हार के वार की
  कौन कहता है क्या,झूठे संसार की
  डर के हालात से जो मौत का साथ ले
  सचमुच बुजदिल वो इंसान होगा
  जीवन की परीक्षा सबसे कठिन है
  पास होकर के खुद पर अभिमान होगा ।
                                     प्रशांत गाहिरे •••

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Category : Nostalgia    13/07/2017


फिलो अवे भाग-3


मुझे यह तो ज्ञात हो गया था कि,वह डायरी अवश्य ही किसी छात्र की थी।मैंने पुनः अपने खाली समय में उस डायरी को खोला एवं पढ़े गए पन्नों को पलटकर नए पन्नों की ओर बढ़ चला परंतु जो मेरे सामने था,उसे देखकर मैं भौचक्का रह गया
                                ये क्या आगे के ढेर सारे पन्ने उस डायरी से फट कर अलग हो चुके थे।कुछ देर तक तो मैं उन पन्नों के फटने का कारण सोचने लगा परंतु कुछ ना सुझने पर आगे बढ़  चला।अंततः मुझे एक शब्दों से परिपूर्ण पन्ना मिला जो इस प्रकार से था-

दिनांक-10-04-2016                              समय-9:40pm

"आज बहुत दिनों के बाद मैंने अपना फेसबुक अकाउंट चेक किया।तभी अचानक मुझे उसकी प्रोफाइल दिख गई, मैंने रूककर उसे फ्रेंड रिकवेस्ट भेजा।किसी ऐसी लड़की को जिसे मैं करीब से नहीं जानता था, भेजा गया मेरा पहला फ्रेंड रिकवेस्ट था।कुछ समय के बाद मुझे पता चला कि,उसने मेरा रिकवेस्ट स्वीकार कर लिया था।मुझे अच्छा लग रहा था,मैंने उसे हाई बोला और उधर से भी सेम मैसेज आया।वैसे तो मैं लड़कियों से बहुत कम बात  करता हूँ लेकिन उससे बात करके अच्छा लगा।पढाई से रिलेटेड हमने बहुत सी बातें की।मुझे पता चला कि,वह भी उसी टाॅपिक पर असाईनमेंट लिखने का सोच रहीं थी,जो मैंने सोचा था।मन ही मन मैंने कहा Same Pinch.....
                                        To be continued.....

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Category : Nostalgia    16/07/2017