The 6th Convocation ceremony at GGV



The convocation ceremony is one of the most memorable and prestigious moment of a student’s life. The moment when all the degree seekers are filled with overflowing emotions; some glowing, few bursting out into tears others trembling with joy !

The convocation ceremony this year at Guru Ghasidas Vishwavidyalay was held after a gap of three years and turned out to be  the most grand ever convocation ceremony of all times. Lacs  were invested in making the event lavish. The chief guest of this year’s grand ceremony was the MHRD minister of the state and one of the renowned cabinet ministers of Chhattisgarh. The gold medallists of all the departments of the University were honoured and degrees were handed over to the students of batch 2014 – 15. The ceremony started from the VC bungalow as the faculty members of the executive council and academic council adorned in the traditional Indian kurta - pajama and turban marched to the Administrative Block where the event commenced with the lighting of the lamp.

The aura throughout the ceremony was mesmerizing. The students were excited for they were being rewarded for their long time achievements and nervous at the same time for they were to be presented before the renowned delegates. The achievers clicked lots of pictures and selfies and made lots of cherishable memories.

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Category : Uncategories    15/10/2017


I WISH



It was clearly the best thing that had happened to me. I remember the first time I met him, I felt nothing! This was obviously not going to work. But it did. He meant so much to me. And like all girls I had dreams of living in a distant land and living happily ever after. I wanted to work like crazy and be the best at everything I do. I am good at what I do, but it is not what I had planned and that makes me sad sometimes.

I still wonder what he must be like. What his work is like. I stalk him on Facebook but I am not on his friend list, so I can’t really know. He is married and I am glad. Even though I cried the day he got married, I am glad. It was my decision to leave him. He doesn’t know anything. How could I do this to him? Living with me is a battle and I just wouldn’t be happy if I made other people suffer.

That evening changed everything. It was a normal day and I was walking home from college, when Anirudh suddenly pulled me back and threw that acid on my face. It took three operations and lot of donation just to get my sight back.

 I have my parents and a lot of good people around me. I am happy. But I still wonder what if I had given him a chance. I never thought I would think of this. I never thought I would still want him. But I am the same person. The same person he knew so well. Still knows so well. I am okay most of the time. I have books and they are my favorite pastime.  But I connect him to every character I read, every song I hear. I wonder what it would be like to be with him, like old times.

I still have the books he gave me. I read them often. And I miss him. And it makes me sad that I don’t get to live with him on a distant land. I missed my chance. But I also worry about what would have happened if he didn’t want me anymore. That would be worse than this, to know that whom you loved did not really love you for what you were.

I am strong and independent, but I am human. I wish I could just know if he would accept me, even if I don’t get to be with him. Maybe someday I’ll know what I did was right or wrong, but my story will still be incomplete.

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Category : Nostalgia    03/09/2017


मुक्तिधाम बनारस



धर्म और निरपेक्ष की नगरी काशी विश्व भर मे अपने सभ्यता और संस्कृति के रूप में जानी जाती है | विश्व की ये एकमात्र ऐसी नगरी है, जिसकी स्थापना स्वयं भोलेनाथ ने किया है और ये उनकी प्रिय भूमि भी है| आनादि काल से यह नगरी भोलेनाथ के त्रिशूल पर टिकी हुयी है| यह प्राचीनतम नगरी दुनिया भर मे काशी , बनारस एवं वाराणसी  नाम से प्रचलित है | काशी का नाम लेते ही बाबा विश्वनाथ जी का स्मरण होता है तो बनारस के नाम से बनारसी पान की खुशबु एवं उसका स्वाद ध्यान में आता है |

                       वाराणसी मे कुल मिलाकर 87 छोटे एवं बड़े घाट है | बनारस के इस गुलजार हिस्से के अलावा एक घाट ऐसा भी है जहा गंगा की ठंडी हवा नही बल्कि हवा में आग की तपिश महसूस होती है | गंगा किनारे बसे इस मणिकर्णिका घाट को स्वर्ग का द्वार कहते है 84 लाख योनी में जन्मोपरांत किसी आत्मा को मानुष तन की प्राप्ति होती है मणिकर्णिका घाट पर दाह संस्कार के पश्चात मनुष्य जीवन और मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाता है| मणिकर्णिका नाम के पीछे एक पौराणिक कथा है | आज से लगभग पांच हजार साल पहले, जब माँ गंगा का स्पर्श बनारस की भूमि में नही हुआ था, तब यहाँ एक कुंड हुआ करता था | विश्व भ्रमण करते हुए भगवान भोलेनाथ माता पार्वती के साथ काशी पहुंचे | स्नान करते समय माता पार्वती के कान का कुण्डल कही गिर गया और वही रहने वाले एक व्यक्ति ने इसे चुरा लिया | भोलेनाथ के कई बार पूछने पर किसी ने इस बारे में कोई जानकरी नही दी | तभी भगवान अपने असली रूप में आये और वहां के लोगो को श्राप दिया कि तुम लोग अनंत काल तक शमशान वासी बनकर रहोगे और मोक्ष प्राप्ति की कामना के लिए यहाँ  आये चिता को मुखाग्नि देते रहोगे | आज उस जाति के लोग डोम जाती के लोग के नाम से जाने जाते है| माता के कान का कुंडल गिरने के कारण इस घाट को मणिकर्णिका घाट कहा जाता है |

                    मणिकर्णिका घाट पर डोम राज चलता है | तत्कालीन डोम राजा का नाम जगदीश चौधरी है | ये कल्लू डोम के वंशज है | कल्लू डोम ने सत्यवादी हरिश्चन्द्र को अपने यहा काम पर रखा था और परम्परा के कारण हरिश्चंद्र को अपने ही बेटे रोहित के दाह संस्कार के लिए कर लेना पड़ा था | तब से लेकर आज ताज मुर्दों से भी कर लेने की परम्परा है | डोम राजा के घर का चूल्हा चिता की आग से जलती है | डोम जाति का मानना है की चिता की लकड़ी से बने भोजन का सेवन करने से मिर्गी की समस्या नही होती |

                    एक ओर जहाँ चारो तरफ शव दाह के वजह से साल के 365 दिन यह शांति फैली रहती है वही चैत्र नवरात्रि के अष्टमी की रात इस घाट पर नगर वधुओं का नृत्य होता है | अष्टमी की रात मणिकर्णिका घाट पर नृत्य करने वाली नगर वधु के माथे से आने वाले अगले जनम मे ये कलंक मिट जाता है |  माहशमशान मणिकर्णिका की एक औए विशेषता है जो भारत के किसी और शमशान घाट में नही है | जलती चिताओ के बीच चिता भस्म द्वारा औघड़ की होली खेली जाती है |

                     मोक्षप्राप्ति की कामना लिये हर साल तीर्थयात्रियों का यह आना होता है | मणिकर्णिका एक मात्र ऐसा घाट है जहाँ साल के 365 दिन चिता की आग जलते रहती है | हर दिन करीब 300 शव मोक्षदायनी माँ गंगा को स्पर्श करके माहशमशान पर मोक्ष प्राप्त करते हैं |

                     मौत अर्थात जीवन का आखिरी सच, शमशान अर्थात जीवन की आखिरी मंजिल और चिता जीवन का आखिरी पड़ाव खामोश, ग़मगीन, शांत हवाओं और चिता की लकडियों के खटकन के आवाज के बीच आत्मा अपने पापी शारीर को त्याग कर मोक्ष को प्राप्त करता है | जिंदगी के एक मात्र शाश्वत सत्य का ज्ञान जलती चिताओ को देखकर होता है |

                   आनादि काल से मणिकर्णिका घाट मनुष्य को पाप से मुक्त कर, मोक्ष प्रदान करते आया है | अब तक यहाँ 2500 करोड़ से अधिक शव दाह हो चुका है आगे भी काशी का यह वीरान स्थान मोक्ष प्राप्ति की कामना लिए व्यक्तियों की जलती चिताओं  का गवाह बना रहेगा | 

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Category : Thoughts    03/09/2017


११: २५ की लास्ट लोकल ...........!


अब तक रात के  ९: २० बज चुके थे, मैं अब भी शांत लहरों की तरह वहां बैठी रही ,हालात कहाँ ले जाना चाहते है मैं नहीं जानती |लोगो को अपनी ज़िन्दगी में आगे बढ़ते देख रही हूँ |मेरे देखने में ही कितने आये और गए पर मैं अब भी ये सोच रही हूँ
की उन्हें अपने प्यार के बारे में बता कर मैंने क्या गलती की ?
लो अब तो १०:१५ बज चुके हैं मेरी नजरो के सामने से फिर से एक ट्रेन जा चुकी हैं जो मुझे मेरे प्यार से मिलवाने ले जा सकती थी | पर....................पर मैं चुप हूँ

क्या पीछे लौट जाऊ उनके पास जिन्होंने मुझे मुझसे मिलवाया या फिर बढ़ जाऊ आगे उसके पास जो मेरा वजूद है | (अरे! ये मेरी अंगूठी कहा गयी जो मुझे लक और हिम्मत देती है ), शायद वो भी मुझसे परेशान हो मेरा साथ छोड़ चली गयी |

मुझे आज भी याद है जब मैंने पापा-मम्मी को अपने प्यार के बारे में बताया था , मम्मी थोड़ा नाराज हुई थी पर पापा शांत खड़े रहे थे | कुछ दिनों बाद मेरे हाथों में पुणे की फ्लाइट की टिकट  पकड़ा कर मुस्कुरा दिए.....................और कहा जाओ
"आरोह" जी लो अपनी ज़िन्दगी |

यहां आकर खुश थी लगा सारा जहान मिल गया पर ढूंढते यूँ तुम न मिले, क्यों न मिले इसका कोई जवाब नहीं है मेरे पास ? (अचानक एक आवाज़ पीछे से गुंजी शायद ये मेरी आत्मा है ,जो मुझसे कुछ कहना चाहती है ...........शायद मैं ही थी जिसने अपनी
ज़िन्दगी के सारे किवाड़  बंद कर रखे थे..............पर.....पर रौशनी तो  उस ही  झरोखे से आती है जिसे हम खोलना भूल जाते है |) अब मैं समझ चुकी हूँ मुझे क्या करना है .....मुझे मुंबई जाना है ,अपने प्यार के पास .....अपनी फिल्मों के पास ....पुरे जहान
के पास..........ये देखो ११:२५ की लास्ट लोकल मेरे सामने कड़ी है मुझे आवाज़ लगाती की आ! "आरोह" जी ले अपनी ज़िन्दगी|
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अपनी मंजिलों के सफर को तय करती "आरोह" अपने हाथों में "धर्मा  प्रोडक्शन " का कॉल लेटर  थामे मुस्कुरा रही थी............................अपने सपनो की ओर बढ़ती एक आकांशी फिल्म डायरेक्टर "आरोह"

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Category : Uncategories    21/08/2017


रोटी के टूकड़े


बहुत दिनों के बाद माँ ने,रोटी आज बनायी थी
शंभु चाचा घर आए थे,चाची भी तसरीफ लायी थी।

चुन्नी,चिंटू,मून्नी,मिंटू सबके चेहरे पर खुशहाली थी,
पेट में चुहे कुद रहे थे पर बाहर हरियाली थी।

बापू के चेहरे पर जाने,कैसे अजब से भाव थे?
बात पुरानी सोच-सोचकर बापू भी पछताए थे।

दद्दू ने बाँटा भाई- भाई को,बाँट दिया घर सारा था,
बर्तन बाँटे,आँगन बाँटा,बाँट दिया चौबारा था।

रोटी के टुकड़े देख-देख कर भाव ये मन में आते थे,
क्या पहले घर के मुखिया,घर को ही आग लगाते थे?

माँ के गहनों को बिकते देखा,बापू को बैल-सा जुतते
देखा और रोते बच्चों को देखा था,
सिमट चुके घर में मैंने,इच्छाओं को मरते देखा था।

शंभु चाचा और बापू के,आँसू ना कम होते हैं,
पता चला है ईसी बात से, अपने तो अपने होते हैं ।

काश! जुड़ पाते रोटी के टुकड़े और मिल पाते बिछड़े जन,
एकल से संयुक्त हो जाते खण्ड-खण्ड में बिखरे मन।

                                         -प्रशांत गाहिरे

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Category : Nostalgia    23/07/2017


जीवन की परीक्षा



  जीवन की परीक्षा सबसे कठिन है
  पास होकर के खुद पर अभिमान होगा
  छुट-पुट इम्तेहानो के डर से बैठना
  जिंदगी  का अपमान होगा
  लड़ते रहना है जब तक श्वास चलती रहे
  हर कदम जीत की सोच पलती रहे
  हौसला ऐसा हो जो दुनिया बदल दे
  कुछ करने की आग यूँ ही जलती रहे
  औरो के लिए जीने का मौका सबसे बड़ा सम्मान होगा
  जिंदगी की परीक्षा सबसे कठिन है
  पास होकर के खुद पर अभिमान होगा ।
  बुजदिल ना बने सदा ध्यान हो
  अपनी खूबी का हरदम हमें भान हो
  किसी की उम्मीद किसी का भरोसा
  टिका है  हम पर सदा ज्ञान हो
  चिंता क्यों हम करें हार के वार की
  कौन कहता है क्या,झूठे संसार की
  डर के हालात से जो मौत का साथ ले
  सचमुच बुजदिल वो इंसान होगा
  जीवन की परीक्षा सबसे कठिन है
  पास होकर के खुद पर अभिमान होगा ।
                                     प्रशांत गाहिरे •••

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Category : Nostalgia    13/07/2017


फिलो अवे भाग-3


मुझे यह तो ज्ञात हो गया था कि,वह डायरी अवश्य ही किसी छात्र की थी।मैंने पुनः अपने खाली समय में उस डायरी को खोला एवं पढ़े गए पन्नों को पलटकर नए पन्नों की ओर बढ़ चला परंतु जो मेरे सामने था,उसे देखकर मैं भौचक्का रह गया
                                ये क्या आगे के ढेर सारे पन्ने उस डायरी से फट कर अलग हो चुके थे।कुछ देर तक तो मैं उन पन्नों के फटने का कारण सोचने लगा परंतु कुछ ना सुझने पर आगे बढ़  चला।अंततः मुझे एक शब्दों से परिपूर्ण पन्ना मिला जो इस प्रकार से था-

दिनांक-10-04-2016                              समय-9:40pm

"आज बहुत दिनों के बाद मैंने अपना फेसबुक अकाउंट चेक किया।तभी अचानक मुझे उसकी प्रोफाइल दिख गई, मैंने रूककर उसे फ्रेंड रिकवेस्ट भेजा।किसी ऐसी लड़की को जिसे मैं करीब से नहीं जानता था, भेजा गया मेरा पहला फ्रेंड रिकवेस्ट था।कुछ समय के बाद मुझे पता चला कि,उसने मेरा रिकवेस्ट स्वीकार कर लिया था।मुझे अच्छा लग रहा था,मैंने उसे हाई बोला और उधर से भी सेम मैसेज आया।वैसे तो मैं लड़कियों से बहुत कम बात  करता हूँ लेकिन उससे बात करके अच्छा लगा।पढाई से रिलेटेड हमने बहुत सी बातें की।मुझे पता चला कि,वह भी उसी टाॅपिक पर असाईनमेंट लिखने का सोच रहीं थी,जो मैंने सोचा था।मन ही मन मैंने कहा Same Pinch.....
                                        To be continued.....

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Category : Nostalgia    16/07/2017


कोशिश की है


 हम ने तुझे कभी नही चाहा
पर तुझे पाने की कोशिश की है,
हम करीब तेरे कभी नही आए
पर पास आने की कोशिश की है ।

तुझे दिमाग मे कभी नही आने दिया
पर दिल मे छुपाने की कोशिश की है,
हालाकि याद रोज़ आते हो तुम
पर तुम्हे हि भूलाने की कोशिश की है ।

हम दूर तुझसे कभी न हो पाएंगे
पर तुझसे हि दूर जाने की कोशिश की है,
हार तो कभी न पाएंगे इस दिल से
पर इस दिल को हाराने की कोशिश की है ।

गिरते है आंसु इस पतझड़ के मौसम में
फिर भी खुद को हँसाने की कोशिश की है,
सच कड़वा है कि चला गया है बसंत
फिर भी इस कड़वे सच को अपनाने की कोशिश की है ।

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Category : Nostalgia    20/06/2017


दोजख कँहा है ?


सवालात फरमाया गया
दोजख कँहा है ?
हाजिर-ए-जवाब आया
जहाँ इस कदर अंधेरा छाया है कि
रवि सहर नही कर पाता
दोजख वहाँ है ।

सवालात फरमाया गया
दोजख कहाँ है ?
हाजिर-ए-जवाब आया
जहाँ अल्ताफ  और नवाज़िस
बेकार और शिफर है
दोजख वहाँ है ।

सवालात फरमाया गया
दोजख कहा है ?
हाजिर-ए-जवाब आया
जहाँ मुसलसल और पासवान
रक़ीब बन जाए
दोजख वहाँ है ।

सवालात फरमाया गया
दोजख कहाँ है ?
हाजिर-ए-जवाब आया
जहाँ उन्स ,लहजा और इनायत
मयस्सर नही है
दोजख वहाँ है ।

सवालात फरमाया गया
दोजख कहाँ है ?
हाजिर-ए-जवाब आया
जहाँ ख्वाब बुनने का हक
फकीर और तंग-हाली को नही
दोजख वहाँ है ।

खुदा ने दोजख बनाया है
तो वह जगह बदस्तूर हि रखे ,
रुख करना  पड़े  वहाँ का हमे
हम ऐसा कोई कर्म न करे ।


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Category : Nostalgia    20/06/2017


वेदना



तन्हाइयों कि चादर ओढ़े,औरो से खुद को छुपाता हुँ।
आखो के गमगीन अंधेरे में,तुम्हे दिल के  करिब पाता हूं।।
वक्त की गहराइयों मे बसी,तेरी यादें तोड़ लाता हुं।
तेरी  झलक ही सही,झलकियों से मन बहलाता हुं।।
तेरी बातो कि फुलवारी पे,कोमल सी सरिता बहाता हुं।
गुमसुम करती जो बातें थी,उन्हें याद कर-कर भुलाता हुं ।
वो हौसला था वक्त का,जिसे थाम के मै रूक जाता हूं।
बेदना तो सिर्फ  अहसास था,तुझे खुद मे बसा पाता हुं।।

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Category : Uncategories    22/06/2017