अंजाने से....


1.उंची उठी लहरे हो तो ,गहराइयों से डरना क्या।
बुलंद हौंसले तो तो, आसमान की उंचाइयां देखते हैं।।
2.कहना है तुमसे,लब्ज ए जिंदगी से।।
किताबों के पन्ने सा हु ,पढ़ले कोई मुझे।।
3.मोहब्बत के समंदर से,कोई जाम ले आए जालिम।
वक्त की तकल्लुफ ही बताएगा,ये जहर है या जाम।।
4.ये जोर है मन का या सबब,जरा गौर आजमाइएगा। 
यहाँ जिंदगी से ज्यादा मौत कि किमत लगाई जाती है।।
5.ये जुल्फो कि अदाएं ,किसके लिए है।
और क्या कहुं ,नजरों ने कह दिया है।।"
6.जुल्फो मे सिमटना तो एक ख्वाहिश है,
अरमा तो कुछ और है बताऊँ क्या ??
7.अल्फाजों से कहना तो वक्त की नजाकत थी।
वरना अपनी आखों से जज्बात रोके से न रूके थे।।

Read More

Category : Uncategories    22/06/2017


Goods & Services Tax (GST)



Goods & Services Tax (GST) is an indirect tax, introduced following the passage of Constitution 122nd Amendment Bill, throughout India to replace all the existing taxes levied by the central and state governments. It is directly under the Union Finance Minister. GST is launching from 1st July 2017 midnight.

There will be three kinds of GST:

CGST: to be collected by central government

SGST: to be collected by state governments for intra-state sales

IGST: to be collected by central government for inter-state sales

Advantages:

·       Transparent tax and reduces the number of indirect taxes.

·       No hidden taxes and lowers the cost of doing business.

·       Prices will come down as double taxation will not be playing a role.

·       It will be levied only at the final destination based on VAT principle and not at various points.

It will help building a transparent and corruption free tax administration.

Disadvantages:

·       Negative impact on real estate hiking up the cost of new homes by about 8%.

·       Some retail products will see a hike in their prices especially clothing.

·       Service taxes or airfare varies from 6%-9%. After GST it will be over 15%, almost double the present rates.

 

GST has been one heck of a hype-cum-trending topic for debate lately. The common man is wondering what would be its effect on the daily life. Whatever be the cause of action, its true conclusion could only be drawn after its implementation. 

Read More

Category : Nostalgia    30/06/2017


जवाब चाहते प्रश्न



बुजुर्ग भटकने को मजबूर क्यों हैं 
दर-दर झुकने को मजबूर क्यों हैं 
देने वाले हाथ फैले हैं क्यों 
उनकी जिंदगी का ये दस्तुर क्यों है 
क्या मिट गई है मानवता जग से
हर जगह स्वार्थ का बसेरा है 
अपना कौर खिलाने वाला 
क्यों भूखे पेट सो रहा है 
तड़प उठता था माँ का हृदय 
जिस बेटे के तन की तपन से
माँ को भटकता छोड़ वो बेटा
सो रहा है क्यों अमन से
निर्बुद्धि बच्चो के पालक
यूँ थक कर चूर क्यों हैं
बुजुर्ग भटकने को मजबूर क्यों हैं
दर-दर झुकने को मजबूर क्यों हैं
जीवन की पूँजी लगा दी 
जिनकी इच्छापूर्ति में 
बिसर गए दाता को क्यों फिर 
वो बच्चे यश और कीर्ति में 
क्या स्वार्थ बह रहा नव पीढ़ी के 
रग में अविरल धारा सा
भटक रही है क्यों बूढ़ी माँ 
बाप फिरे क्यों मारा सा
सबको गले लगाने वाले 
अपनों से दूर क्यों हैं
बुजुर्ग भटकने को मजबूर क्यों हैं
दर-दर झुकने को मजबूर क्यों हैं                                                    ------ प्रशांत गाहिरे

Read More

Category : Thoughts    11/06/2017


फिलो अवे भाग-2


अगले दिन भी प्रत्येक क्षण वहीं दो शब्द मस्तिष्क में गुँज रहे थे-"फिलो अवे"।मैंने उन शब्दों का अर्थ गूगल पर भी छान मारा,मुझे ढेरों अर्थ मिले परंतु मुझे उन शब्दों के वास्तविक अर्थ की प्राप्ति न हो सकी।अपने खाली समय में मैं उस डायरी को लेकर एकांत में बैठ गया और अर्धमन से पन्ना पलटाया।अगला पन्ना लेखक के शब्दों में ऐसा था-

दिनांक- 21/07/2015                   समय-8:45pm

"आज काॅलेज का पहला दिन था और अजीब-सी घबराहट थी मन में।बारहवीं कक्षा तक का सफर तो अच्छा ही रहा लेकिन अब भगवान जाने आगे आगे क्या होगा?ऐसा लग रहा था कि,जैसे सब काॅलेज घुमने आए थे।उन दो लड़कियाँ को देखकर जो सीढ़ियों पर बैठी थीं ऐसा लगा जैसे वे माॅडलिंग करने काॅलेज आयीं थीं ।काॅलेज के पहले दिन ही मैंने जान लिया कि,काॅलेज ठीक वैसा ही होता है जैसा मैंने सोचा था क्योंकि मुझे कुछ लड़के बाइक उड़ाते भी दिख गए थे ।
                           आज पहली बार ये एहसास हुआ कि, मैं बड़ा हो गया हूँ, मेरा प्यारा बचपन गुजर चुका है और मैं बड़े लोगों के बीच हूँ ।आज एक भी क्लास नहीं लगी इसलिए थोड़ा अच्छा लग रहा था।दोपहर में मैं काॅलेज के कैंटीन पहुँचा जहाँ लोग नाश्ता करने कम,बतियाने ज्यादा पहुँचे थे।कैंटीन के अंतिम छोर पर अपनी ही दुनिया में खोए,जोड़ो को देखकर  मैं सोच रहा था कि,वे काॅलेज पढ़ने आते हैं या ये सब करने अचानक मुझे पापा की वह बात याद आ गई जो उन्होंने घर से निकलते वक्त मुझसे कहा था कि- काॅलेज जाकर कई लोग भटक जाते हैं ।तब मैंने पापा से न भटकने का वादा किया 
था।काॅलेज के पहले ही दिन ने बहुत थका दिया।किराए के कमरे में खुद से बनाया गया खाना खाते वक्त माँ की याद आ रही थी कि,कैसे बहुत अच्छे खाने में भी मैं कमियाॅ निकाला करता था और आज कमियों से भरे खाने को भी बिना किसी शिकायत के खा रहा था "।
                To be continued....

Read More

Category : Nostalgia    12/06/2017


कौन


                     

मै छूना चाहूँ आसमान 
मुझमे हंस सा साहस लाएगा कौन 

मैं फतह करुं हर एवरेस्ट 
पर मेरी मंज़िल तक मुझे पहुंचाएगा कौन

मैं बदल सकूँ सारी दुनिया 
पर मुझमे छुपे ज्वालामुखी को धधकायेगा कौन

हर जगह जल्लाद रूपी दुर्भावना का साया है 
मेरे मन मंदिर को पवित्र कराएगा कौन 

बर्बाद करे आलस्य-रोग मुझे 
कर्मठता की संजीवनी मुझे खिलायेगा कौन 

हैं मेरी आँखों  में ये शहद स्वप्न 
मुझमें मधुमक्खियों सी साधना लायेगा कौन

मैं पाना चाहूँ अध्यात्म-रत्न
ज्ञान के सागर में गोते लगायेगा कौन

गर मैं भी बन जाऊं धन कुबेर 
तो जा सरहद पर लहू बहायेगा कौन 

जो इहः लोक में दुः शाशन से कर्म किये
तो परलोक में परमात्मा से नज़रें मिलायेगा कौन

गर  अर्जुन ही भयभीत हो जाए
तो निज पाखंडियो को सबक सिखाएगा कौन

गर  जीवन के इस महाभारत में नही लड़ा
तो मेरी शौर्यगाथा दुनिया को सुनाएगा कौन 



काव्य रचनाकार

शैलेष पांडे

Read More

Category : Thoughts    12/06/2017


सच्चा देशभक्त : बास्को


सच्चा देशभक्त : बास्को


यह एक सच्ची घटना है जो दो दशक पहले की है जब भारतीय सेना कश्मीरी घुसपैठियों के खिलाफ संघर्ष कर रही थी 

कारगिल सेक्टर के बेस कैंप में सेना के डॉग मास्टर  मेजर नारायण राणा अपने सर्च डॉग बास्को के साथ रोज़ लैंडमाइंस की खोज पर जाया करते थे हर रोज़ के भांति उस रोज़ भी सर्द हवाएं चल रही थी सुबह के करीब 8 बजे थे और मेजर राणा अपने समझदार साथी  बास्को के साथ गश्त पर थे सेना के इस समझदार डॉग की सूझबूझ ने कई बार बड़े हादसों को टाला था इसलिए सब उसकी काबिलियत पर काफी भरोसा करते थे

उस दोपहर वहां से सेना के अफसरों का एक बड़ा काफिला गुज़रने वाला था इसलिए हर संभव सावधानी बरती जा रही थी 

कैंप के गेट के बाहर स्थानीय निवासी क़ादिर की चाय की दुकान थी जहा अक्सर जवान आया जाया करते थे क़ादिर सेना को संदिग्धों की मुखबिरी भी किया करता था इसलिए मेजर भी वहां अक्सर रुका करते थे और क़ादिर से उनकी अच्छी जमती थी 

उस रोज़ क़ादिर की दुकान पर एक अजनबी भी था और बातचीत में उसने मेजर से वहां रोज़गार के लिए आए होने की बात कही लेकिन आज हमेशा अपनी धुन में रहने वाला बास्को उसपर काफी भौक रहा था यह बात मेजर को भी अस्वाभाविक लगी लेकिन मेजर बास्को को लेकर वहां से चले गए 

बास्को बार बार क़ादिर की दुकान की तरफ बढ़ने की कोशिश करता लेकिन मेजर राणा को लगा कि शायद बास्को की दिलचस्पी वहां रखे बिस्किटों में है 
कैम्प पहुँच मेजर ने उसे बाँध दिया और पोस्ट पर चले गए लेकिन बास्को लगातार भौकता रहा 

घंटो की मशक्कत के बाद बास्को वहां से अपनी चेन तुड़वा कर भाग निकला और सीधा क़ादिर की दुकान की तरफ बढ़ा उसे लग रहा था कि वहां कुछ तो गड़बड़ ज़रूर है जैसे ही वह गेट की पास पहुंचा तो उसने देखा कि क़ादिर उस अजनबी के साथ मिलकर पूरे क्षेत्र में विस्फोटकों का जाल बिछवा चुका था और थोड़ी ही देर में सेना का काफिला वहां पहुँचने वाला था

बास्को वतन को संकट में देख बिना वक्त गवाये उस अजनबी पर टूट पड़ा और उसकी गर्दन पर अपने दांत गड़ा दिए यह देख गद्दार क़ादिर ने उसपर चाक़ू से कई वार किए लेकिन उसने अपने  दांतो के घातक वार से उस आतंकी को अधमरा कर दिया और पूरी ताक़त बटोर क़ादिर पर टूट पड़ा और उसे अपनी मज़बूत पकड़ से रोके रखा 

सेना के काफिले में सबसे आगे चल रहे लेफ्टिनेंट शिंदे ने संदिग्धों को दूर से देख फौरन काफिले को रोक दिया और जब सेना की एक पैदल टुकड़ी  वहां पहुंची तो  उन्होंने देखा कि दोनों गद्दार  विस्फोटकों के ढेर के बीच अचेत पड़े हुए हैं और अपनी आखरी साँस तक लड़ने वाला सेना का वफादार बास्को शहीद हो गया है लेकिन उसने सैकड़ो सैनिकों की जान बचा ली 

लेफ्टिनेंट साहब ने बड़े गंभीर स्वर में कहा कि *आज इस बेज़ुबान ने साबित कर दिया  कि इंसानो से कहीं बेहतर जानवर हैं जिनमे इंसानो से कहीं ज़्यादा इंसानियत  हैं*

अगर बास्को एक कुत्ता न हो के कोई इंसान होता तो शायद वीरता की इस अनोखी शौर्यगाथा को दुनिया के सामने आने में 20 साल का समय नही लगता 


कहानी
शैलेष पांडेय

Read More

Category : Nostalgia    12/06/2017


वह पापा की शहज़ादी थी


वह पापा की शहज़ादी थी
बड़े नाज़ों से वो पली बढ़ी
मेहनत की उसने जीवन में
और हुई अपने पैरों पे खड़ी

वो गयी बड़े एक शहर में
रम गयी जीवन की लहर में
वह ना जान सकी अँधेरा है
हैवानियत का वहां बसेरा है

उस रात उसे कुछ देर हुई
सब चले गए वह तनहा थी
दरिंदगी जिसके करीब थी
एक बेबस सा वो लम्हा थी

थी सहमी सी वो उन राहों में
तब उसको था एक हाथ दिखा
मानवता का वह हत्यारा 
अपने साथियों के साथ दिखा

एक मोड़ जहां अँधेरा था 
था वहां भेड़ियों का साया
जब आँखें खोली उसने तो
उन दरिंदों को था सामने पाया

एक बेटी उस दिन चीखी थी
पर कोई मदद ना मिली उसे
उन भेड़ियों ने उसको नोचा 
और वहीं तड़पता छोड़ गए

बड़ा शर्मनाक वह मंज़र था
थी इंसानियत सबकी खोयी
उसकी हालत को देख देख
मानवता तिल-तिल कर रोयी

जब उसके पापा को सच पता चला
उनका दिल सहसा दहल गया
जो चेहरा कल तक खिला सा था
वो चेहरा बिलकुल बदल गया

लाखों चेहरे यूँ ही बदले
जीवन लाखों यूं ही बिगड़े
खुले गुनहगार वो  घूम रहे
ताक़त के नशे में झूम रहे

कानूनी हाथ हुए छोटे
शायद लालच ने है उन्हें तोड़ दिया
गुनहगार तो यूँ हम सब भी है
जो उन कुत्तो को आवारा छोड़ दिया

निर्भया के लिए जी लगा दिया
फिर भी ना उसको बचा सके
हाँ दर्द मुझे भी हुआ था जब
गुनाहगारों को सज़ा न दिला सके

आवाज़ उठेगी  जब जब भी
निज पाखंडी उसे दबाएंगे
बदलाव तभी है सम्भव जब
हम सब मिलकर सामने आएंगे

हैं लाखों लड़कियां उस जैसी।
इन्साफ जिन्हें है मिला नही
हर पल इसी ख़ौफ़ में जीती हूँ
कहीं मैं तो अगली निर्भया नही




*काव्य-रचना*
*शैलेष कुमार पांडेय*
*जी.जी.यू. बिलासपुर*
✍✍✍✍✍✍✍✍

Read More

Category : Nostalgia    12/06/2017


सत्ता विध्वंस


जो कुर्सी पर जाता है  वो ही घमंडी हो जाता है
न जाने  उनमें इतना पाखण्ड कहाँ से आता है 

राष्ट्रवाद के नारे सारे किसी कोने में दुबक के रोते हैं
और हमारे प्रतिनिधि मखमली  कम्बल लपेट कर सोते हैं 
देश का पोषक किसान तब बैरी नजर आता है
राजकोष का सारा रुपया धनपशु नोचकर खाता है  

भ्रष्टाचार , कालाधन,रोज़गार चुनावी जुमले होते हैं 
 सरसों के खेतों में ये समझो नागफनी को बोते हैं
श्वान  सरीखा  देश भी सिहों को आँख दिखाता है
तब मेरा ह्रदय उन चुनावी वादों को सरेराह नंगा पाता है


राजनितिक रूढ़ता से ग्रसित स्वार्थीयों संतानों सुनो
जनता के दुःख दर्दो से बेखबर ओ नादान सुनो
ये हिंदुस्तान हमारा है हमें खून पसीने से सींचना आता है 
जहा दिलों में है बसता भगत सिंह जो वीरगति को पाता है

अब चाहे हो कोई दल या कोई नेता सुधरने का अवसर एक न होगा
अब प्रजातंत्र की शक्ति दिखेगी 
 पाखण्ड पर संयमित विवेक न होगा

जब निज प्रजातन्त्र का सेवक ही मदमस्त हाथी हो जाता है 
साठ करोड़ जवानों को अंकुश भी थामना आता है   
अंकुश भी थामना आता है 
अंकुश भी थामना आता है

शैलेष पांडेय

Read More

Category : Nostalgia    12/06/2017


स्वाभिमान का जीवन


स्वाभिमान का जीवन

तरक्की की फसल मैं भी काट लेता
अगर औरों की तरह तलवे, मैं भी चाट लेता

बस मेरे लहज़े में जी हुज़ूर, नही था
इसके अलावा मेरा कोई कसूर नही था

मुश्किलें लाखों थी रास्ते में मेरे 
अपनों ने भी उपहास किये जख्मों पर मेरे

अगर पल भर के लिए भी मैं बे-ज़मीर हो जाता
तो इस शोहरत की दुनिया में मैं कब का अमीर हो जाता


Read More

Category : Nostalgia    12/06/2017


फिलो अवे



ठीक ऐसा ही विचार मेरे मन में भी आया था-"यह क्या है "?

                        वह दिन भी किसी आम दिन की तरह था।उस दिन  काॅलेज से वापस लौटते वक्त सहसा मेरा पूरा ध्यान एक अजीब-सी वस्तु पर जाकर ठहर गया,पास जाकर देखने पर पता चला कि वह एक डायरी है।मैं उस डायरी के मालिक को आस-पास ढूंढने लगा परंतु किसी को आस-पास न पाकर उस डायरी को उठा लिया लेकिन तभी मेरे मन में ख्याल आया कि किसी की डायरी पढ़ना अच्छी बात नहीं और इस वजह से मैंने उस डायरी को न पढ़ने का निश्चय किया ।मनुष्य  की फितरत है कि,उसे जिस काम के लिए मना किया जाता है, वह वही करता है इसलिए मैने भी उस डायरी को अपने पास रख लिया एवं अपने हाॅस्टल आ गया।मन में अजीब-से विचार आ रहे थे कि- "कहीं कोई गलती तो नहीं हो गई,कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं, क्या होगा उस डायरी में "आदि।मैं उस डायरी को पढ़ने के लिए बहुत उत्साहित था और आखिर रात 9:00 बजे वह क्षण आ ही गया।मेरे आँखों में अजीब सी चमक थी,चेहरे पर थोड़ी घबराहट और शरीर में अजीब-सा कम्पन।
                       ज्यों ही मैने डायरी को खोला मैं आश्चर्यचकित रह गया क्योंकि उसमें न तो किसी का नाम था,न पता और न ही फोन नंबर।उसमें केवल दो अजीब-से शब्द लिखे थे-"फिलो अवे"।मैं उन शब्दों का अर्थ जानना चाहता था परंतु उस रात न जान पाया।उस रात बहुत मुश्किल से सो पाया,मन में सिर्फ दो शब्द चल रहे थे-"फिलो अवे"।
                           To be continued.........

Read More

Category : Nostalgia    08/06/2017