मुक्तिधाम बनारस



धर्म और निरपेक्ष की नगरी काशी विश्व भर मे अपने सभ्यता और संस्कृति के रूप में जानी जाती है | विश्व की ये एकमात्र ऐसी नगरी है, जिसकी स्थापना स्वयं भोलेनाथ ने किया है और ये उनकी प्रिय भूमि भी है| आनादि काल से यह नगरी भोलेनाथ के त्रिशूल पर टिकी हुयी है| यह प्राचीनतम नगरी दुनिया भर मे काशी , बनारस एवं वाराणसी  नाम से प्रचलित है | काशी का नाम लेते ही बाबा विश्वनाथ जी का स्मरण होता है तो बनारस के नाम से बनारसी पान की खुशबु एवं उसका स्वाद ध्यान में आता है |

                       वाराणसी मे कुल मिलाकर 87 छोटे एवं बड़े घाट है | बनारस के इस गुलजार हिस्से के अलावा एक घाट ऐसा भी है जहा गंगा की ठंडी हवा नही बल्कि हवा में आग की तपिश महसूस होती है | गंगा किनारे बसे इस मणिकर्णिका घाट को स्वर्ग का द्वार कहते है 84 लाख योनी में जन्मोपरांत किसी आत्मा को मानुष तन की प्राप्ति होती है मणिकर्णिका घाट पर दाह संस्कार के पश्चात मनुष्य जीवन और मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाता है| मणिकर्णिका नाम के पीछे एक पौराणिक कथा है | आज से लगभग पांच हजार साल पहले, जब माँ गंगा का स्पर्श बनारस की भूमि में नही हुआ था, तब यहाँ एक कुंड हुआ करता था | विश्व भ्रमण करते हुए भगवान भोलेनाथ माता पार्वती के साथ काशी पहुंचे | स्नान करते समय माता पार्वती के कान का कुण्डल कही गिर गया और वही रहने वाले एक व्यक्ति ने इसे चुरा लिया | भोलेनाथ के कई बार पूछने पर किसी ने इस बारे में कोई जानकरी नही दी | तभी भगवान अपने असली रूप में आये और वहां के लोगो को श्राप दिया कि तुम लोग अनंत काल तक शमशान वासी बनकर रहोगे और मोक्ष प्राप्ति की कामना के लिए यहाँ  आये चिता को मुखाग्नि देते रहोगे | आज उस जाति के लोग डोम जाती के लोग के नाम से जाने जाते है| माता के कान का कुंडल गिरने के कारण इस घाट को मणिकर्णिका घाट कहा जाता है |

                    मणिकर्णिका घाट पर डोम राज चलता है | तत्कालीन डोम राजा का नाम जगदीश चौधरी है | ये कल्लू डोम के वंशज है | कल्लू डोम ने सत्यवादी हरिश्चन्द्र को अपने यहा काम पर रखा था और परम्परा के कारण हरिश्चंद्र को अपने ही बेटे रोहित के दाह संस्कार के लिए कर लेना पड़ा था | तब से लेकर आज ताज मुर्दों से भी कर लेने की परम्परा है | डोम राजा के घर का चूल्हा चिता की आग से जलती है | डोम जाति का मानना है की चिता की लकड़ी से बने भोजन का सेवन करने से मिर्गी की समस्या नही होती |

                    एक ओर जहाँ चारो तरफ शव दाह के वजह से साल के 365 दिन यह शांति फैली रहती है वही चैत्र नवरात्रि के अष्टमी की रात इस घाट पर नगर वधुओं का नृत्य होता है | अष्टमी की रात मणिकर्णिका घाट पर नृत्य करने वाली नगर वधु के माथे से आने वाले अगले जनम मे ये कलंक मिट जाता है |  माहशमशान मणिकर्णिका की एक औए विशेषता है जो भारत के किसी और शमशान घाट में नही है | जलती चिताओ के बीच चिता भस्म द्वारा औघड़ की होली खेली जाती है |

                     मोक्षप्राप्ति की कामना लिये हर साल तीर्थयात्रियों का यह आना होता है | मणिकर्णिका एक मात्र ऐसा घाट है जहाँ साल के 365 दिन चिता की आग जलते रहती है | हर दिन करीब 300 शव मोक्षदायनी माँ गंगा को स्पर्श करके माहशमशान पर मोक्ष प्राप्त करते हैं |

                     मौत अर्थात जीवन का आखिरी सच, शमशान अर्थात जीवन की आखिरी मंजिल और चिता जीवन का आखिरी पड़ाव खामोश, ग़मगीन, शांत हवाओं और चिता की लकडियों के खटकन के आवाज के बीच आत्मा अपने पापी शारीर को त्याग कर मोक्ष को प्राप्त करता है | जिंदगी के एक मात्र शाश्वत सत्य का ज्ञान जलती चिताओ को देखकर होता है |

                   आनादि काल से मणिकर्णिका घाट मनुष्य को पाप से मुक्त कर, मोक्ष प्रदान करते आया है | अब तक यहाँ 2500 करोड़ से अधिक शव दाह हो चुका है आगे भी काशी का यह वीरान स्थान मोक्ष प्राप्ति की कामना लिए व्यक्तियों की जलती चिताओं  का गवाह बना रहेगा | 

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Category : Thoughts    03/09/2017