कौन


                     

मै छूना चाहूँ आसमान 
मुझमे हंस सा साहस लाएगा कौन 

मैं फतह करुं हर एवरेस्ट 
पर मेरी मंज़िल तक मुझे पहुंचाएगा कौन

मैं बदल सकूँ सारी दुनिया 
पर मुझमे छुपे ज्वालामुखी को धधकायेगा कौन

हर जगह जल्लाद रूपी दुर्भावना का साया है 
मेरे मन मंदिर को पवित्र कराएगा कौन 

बर्बाद करे आलस्य-रोग मुझे 
कर्मठता की संजीवनी मुझे खिलायेगा कौन 

हैं मेरी आँखों  में ये शहद स्वप्न 
मुझमें मधुमक्खियों सी साधना लायेगा कौन

मैं पाना चाहूँ अध्यात्म-रत्न
ज्ञान के सागर में गोते लगायेगा कौन

गर मैं भी बन जाऊं धन कुबेर 
तो जा सरहद पर लहू बहायेगा कौन 

जो इहः लोक में दुः शाशन से कर्म किये
तो परलोक में परमात्मा से नज़रें मिलायेगा कौन

गर  अर्जुन ही भयभीत हो जाए
तो निज पाखंडियो को सबक सिखाएगा कौन

गर  जीवन के इस महाभारत में नही लड़ा
तो मेरी शौर्यगाथा दुनिया को सुनाएगा कौन 



काव्य रचनाकार

शैलेष पांडे

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Category : Thoughts    12/06/2017


सच्चा देशभक्त : बास्को


सच्चा देशभक्त : बास्को


यह एक सच्ची घटना है जो दो दशक पहले की है जब भारतीय सेना कश्मीरी घुसपैठियों के खिलाफ संघर्ष कर रही थी 

कारगिल सेक्टर के बेस कैंप में सेना के डॉग मास्टर  मेजर नारायण राणा अपने सर्च डॉग बास्को के साथ रोज़ लैंडमाइंस की खोज पर जाया करते थे हर रोज़ के भांति उस रोज़ भी सर्द हवाएं चल रही थी सुबह के करीब 8 बजे थे और मेजर राणा अपने समझदार साथी  बास्को के साथ गश्त पर थे सेना के इस समझदार डॉग की सूझबूझ ने कई बार बड़े हादसों को टाला था इसलिए सब उसकी काबिलियत पर काफी भरोसा करते थे

उस दोपहर वहां से सेना के अफसरों का एक बड़ा काफिला गुज़रने वाला था इसलिए हर संभव सावधानी बरती जा रही थी 

कैंप के गेट के बाहर स्थानीय निवासी क़ादिर की चाय की दुकान थी जहा अक्सर जवान आया जाया करते थे क़ादिर सेना को संदिग्धों की मुखबिरी भी किया करता था इसलिए मेजर भी वहां अक्सर रुका करते थे और क़ादिर से उनकी अच्छी जमती थी 

उस रोज़ क़ादिर की दुकान पर एक अजनबी भी था और बातचीत में उसने मेजर से वहां रोज़गार के लिए आए होने की बात कही लेकिन आज हमेशा अपनी धुन में रहने वाला बास्को उसपर काफी भौक रहा था यह बात मेजर को भी अस्वाभाविक लगी लेकिन मेजर बास्को को लेकर वहां से चले गए 

बास्को बार बार क़ादिर की दुकान की तरफ बढ़ने की कोशिश करता लेकिन मेजर राणा को लगा कि शायद बास्को की दिलचस्पी वहां रखे बिस्किटों में है 
कैम्प पहुँच मेजर ने उसे बाँध दिया और पोस्ट पर चले गए लेकिन बास्को लगातार भौकता रहा 

घंटो की मशक्कत के बाद बास्को वहां से अपनी चेन तुड़वा कर भाग निकला और सीधा क़ादिर की दुकान की तरफ बढ़ा उसे लग रहा था कि वहां कुछ तो गड़बड़ ज़रूर है जैसे ही वह गेट की पास पहुंचा तो उसने देखा कि क़ादिर उस अजनबी के साथ मिलकर पूरे क्षेत्र में विस्फोटकों का जाल बिछवा चुका था और थोड़ी ही देर में सेना का काफिला वहां पहुँचने वाला था

बास्को वतन को संकट में देख बिना वक्त गवाये उस अजनबी पर टूट पड़ा और उसकी गर्दन पर अपने दांत गड़ा दिए यह देख गद्दार क़ादिर ने उसपर चाक़ू से कई वार किए लेकिन उसने अपने  दांतो के घातक वार से उस आतंकी को अधमरा कर दिया और पूरी ताक़त बटोर क़ादिर पर टूट पड़ा और उसे अपनी मज़बूत पकड़ से रोके रखा 

सेना के काफिले में सबसे आगे चल रहे लेफ्टिनेंट शिंदे ने संदिग्धों को दूर से देख फौरन काफिले को रोक दिया और जब सेना की एक पैदल टुकड़ी  वहां पहुंची तो  उन्होंने देखा कि दोनों गद्दार  विस्फोटकों के ढेर के बीच अचेत पड़े हुए हैं और अपनी आखरी साँस तक लड़ने वाला सेना का वफादार बास्को शहीद हो गया है लेकिन उसने सैकड़ो सैनिकों की जान बचा ली 

लेफ्टिनेंट साहब ने बड़े गंभीर स्वर में कहा कि *आज इस बेज़ुबान ने साबित कर दिया  कि इंसानो से कहीं बेहतर जानवर हैं जिनमे इंसानो से कहीं ज़्यादा इंसानियत  हैं*

अगर बास्को एक कुत्ता न हो के कोई इंसान होता तो शायद वीरता की इस अनोखी शौर्यगाथा को दुनिया के सामने आने में 20 साल का समय नही लगता 


कहानी
शैलेष पांडेय

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Category : Nostalgia    12/06/2017


वह पापा की शहज़ादी थी


वह पापा की शहज़ादी थी
बड़े नाज़ों से वो पली बढ़ी
मेहनत की उसने जीवन में
और हुई अपने पैरों पे खड़ी

वो गयी बड़े एक शहर में
रम गयी जीवन की लहर में
वह ना जान सकी अँधेरा है
हैवानियत का वहां बसेरा है

उस रात उसे कुछ देर हुई
सब चले गए वह तनहा थी
दरिंदगी जिसके करीब थी
एक बेबस सा वो लम्हा थी

थी सहमी सी वो उन राहों में
तब उसको था एक हाथ दिखा
मानवता का वह हत्यारा 
अपने साथियों के साथ दिखा

एक मोड़ जहां अँधेरा था 
था वहां भेड़ियों का साया
जब आँखें खोली उसने तो
उन दरिंदों को था सामने पाया

एक बेटी उस दिन चीखी थी
पर कोई मदद ना मिली उसे
उन भेड़ियों ने उसको नोचा 
और वहीं तड़पता छोड़ गए

बड़ा शर्मनाक वह मंज़र था
थी इंसानियत सबकी खोयी
उसकी हालत को देख देख
मानवता तिल-तिल कर रोयी

जब उसके पापा को सच पता चला
उनका दिल सहसा दहल गया
जो चेहरा कल तक खिला सा था
वो चेहरा बिलकुल बदल गया

लाखों चेहरे यूँ ही बदले
जीवन लाखों यूं ही बिगड़े
खुले गुनहगार वो  घूम रहे
ताक़त के नशे में झूम रहे

कानूनी हाथ हुए छोटे
शायद लालच ने है उन्हें तोड़ दिया
गुनहगार तो यूँ हम सब भी है
जो उन कुत्तो को आवारा छोड़ दिया

निर्भया के लिए जी लगा दिया
फिर भी ना उसको बचा सके
हाँ दर्द मुझे भी हुआ था जब
गुनाहगारों को सज़ा न दिला सके

आवाज़ उठेगी  जब जब भी
निज पाखंडी उसे दबाएंगे
बदलाव तभी है सम्भव जब
हम सब मिलकर सामने आएंगे

हैं लाखों लड़कियां उस जैसी।
इन्साफ जिन्हें है मिला नही
हर पल इसी ख़ौफ़ में जीती हूँ
कहीं मैं तो अगली निर्भया नही




*काव्य-रचना*
*शैलेष कुमार पांडेय*
*जी.जी.यू. बिलासपुर*
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Category : Nostalgia    12/06/2017


सत्ता विध्वंस


जो कुर्सी पर जाता है  वो ही घमंडी हो जाता है
न जाने  उनमें इतना पाखण्ड कहाँ से आता है 

राष्ट्रवाद के नारे सारे किसी कोने में दुबक के रोते हैं
और हमारे प्रतिनिधि मखमली  कम्बल लपेट कर सोते हैं 
देश का पोषक किसान तब बैरी नजर आता है
राजकोष का सारा रुपया धनपशु नोचकर खाता है  

भ्रष्टाचार , कालाधन,रोज़गार चुनावी जुमले होते हैं 
 सरसों के खेतों में ये समझो नागफनी को बोते हैं
श्वान  सरीखा  देश भी सिहों को आँख दिखाता है
तब मेरा ह्रदय उन चुनावी वादों को सरेराह नंगा पाता है


राजनितिक रूढ़ता से ग्रसित स्वार्थीयों संतानों सुनो
जनता के दुःख दर्दो से बेखबर ओ नादान सुनो
ये हिंदुस्तान हमारा है हमें खून पसीने से सींचना आता है 
जहा दिलों में है बसता भगत सिंह जो वीरगति को पाता है

अब चाहे हो कोई दल या कोई नेता सुधरने का अवसर एक न होगा
अब प्रजातंत्र की शक्ति दिखेगी 
 पाखण्ड पर संयमित विवेक न होगा

जब निज प्रजातन्त्र का सेवक ही मदमस्त हाथी हो जाता है 
साठ करोड़ जवानों को अंकुश भी थामना आता है   
अंकुश भी थामना आता है 
अंकुश भी थामना आता है

शैलेष पांडेय

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Category : Nostalgia    12/06/2017


स्वाभिमान का जीवन


स्वाभिमान का जीवन

तरक्की की फसल मैं भी काट लेता
अगर औरों की तरह तलवे, मैं भी चाट लेता

बस मेरे लहज़े में जी हुज़ूर, नही था
इसके अलावा मेरा कोई कसूर नही था

मुश्किलें लाखों थी रास्ते में मेरे 
अपनों ने भी उपहास किये जख्मों पर मेरे

अगर पल भर के लिए भी मैं बे-ज़मीर हो जाता
तो इस शोहरत की दुनिया में मैं कब का अमीर हो जाता


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Category : Nostalgia    12/06/2017